परीक्षा का दबाव : ‘पर’ की दौड़ या आत्म-खोज की यात्रा? अंकों, अपेक्षाओं और प्रतिस्पर्धा के बीच क्या खो रहा है विद्यार्थी का ‘स्व’?

परीक्षा का दबाव : ‘पर’ की दौड़ या आत्म-खोज की यात्रा?  अंकों, अपेक्षाओं और प्रतिस्पर्धा के बीच क्या खो रहा है विद्यार्थी का ‘स्व’?

परीक्षा का दबाव : ‘पर’ की दौड़ या आत्म-खोज की यात्रा?

अंकों, अपेक्षाओं और प्रतिस्पर्धा के बीच क्या खो रहा है विद्यार्थी का ‘स्व’?

 

 

 

 

बिलासपुर –  चांपा जिला में जन्मे एवं शिक्षा के क्षेत्र में अपना जीवन का अमूल्य समय देने वाले वाले बुद्धजीवी, शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ डॉ भूपेंद्र धर दीवान कहते है कि बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम घोषित होने का दिन केवल अंक-पत्र का दिन नहीं होता बल्कि अनेक घरों में आशा, चिंता, उत्साह और निराशा का दिन भी होता है। कहीं 95 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी स्वयं को सफल मानने के बजाय इस बात से व्यथित है कि उसके मित्र को 97 प्रतिशत अंक मिले हैं। कहीं एक अभिभावक अपने बच्चे की सीखने की प्रक्रिया से अधिक उसकी रैंक को लेकर चिंतित है। कहीं कोई किशोर यह सोचकर बेचैन है कि यदि वह अपेक्षित अंक नहीं ला पाया, तो उसके भविष्य का क्या होगा।

 

ये दृश्य अपवाद नहीं हैं; वे हमारे समय की शैक्षिक वास्तविकताओं का प्रतिबिंब हैं। आज परीक्षा केवल ज्ञान का मूल्यांकन नहीं, बल्कि भविष्य, प्रतिष्ठा और सफलता का पर्याय बनती जा रही है। ऐसे में एक मूलभूत प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है—क्या परीक्षा वास्तव में सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है, या फिर वह दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करने की एक अंतहीन दौड़ बन चुकी है?

शिक्षा-दर्शन के प्रख्यात विचारक जॉन डेवी का कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है— शिक्षा जीवन की तैयारी नहीं, बल्कि स्वयं जीवन है।

यदि यह सत्य है, तो परीक्षा को भी जीवन और सीखने की प्रक्रिया का सहयोगी होना चाहिए, भय और दबाव का पर्याय नहीं।

 

 

1. परीक्षा : मूल्यांकन से प्रदर्शन-केंद्रित व्यवस्था तक

परीक्षा का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों की समझ, कौशल, जिज्ञासा और सीखने की क्षमता का आकलन करना था। यह शिक्षा-प्रक्रिया का साधन थी, न कि उसका अंतिम लक्ष्य। किंतु समय के साथ परीक्षा का स्वरूप बदलता गया और वह सीखने की प्रक्रिया से अधिक उपलब्धि की प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनती चली गई।

आज अनेक विद्यार्थियों के लिए परीक्षा का अर्थ ज्ञान नहीं, बल्कि अंक, रैंक और चयन बनकर रह गया है। परिणामस्वरूप शिक्षा का व्यापक उद्देश्य संकुचित होकर प्रदर्शन-केंद्रित संस्कृति में परिवर्तित होता दिखाई देता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन का यह कथन इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है— हर महत्वपूर्ण चीज़ को मापा नहीं जा सकता और हर मापी जाने वाली चीज़ महत्वपूर्ण नहीं होती।

 

2. ‘पर’ की दुनिया : अपेक्षाओं का बढ़ता दबाव

आज का विद्यार्थी केवल प्रश्नपत्रों से नहीं, बल्कि अनेक अदृश्य अपेक्षाओं से भी जूझ रहा है। माता-पिता के सपने, समाज की तुलना, रिश्तेदारों की अपेक्षाएँ और सफलता की पूर्वनिर्धारित धारणाएँ मिलकर ऐसा वातावरण निर्मित करती हैं, जहाँ व्यक्ति का ‘स्व’ धीरे-धीरे पीछे छूटने लगता है।

स्वामी विवेकानंद का कथन है— शिक्षा मनुष्य में निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।

दुर्भाग्यवश वर्तमान व्यवस्था में यह आंतरिक क्षमता अक्सर बाहरी अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाती है।

 

3. कोचिंग संस्कृति : सफलता की फैक्ट्री या सीखने का माध्यम?

पिछले दो दशकों में कोचिंग उद्योग ने शिक्षा के परिदृश्य को गहराई से प्रभावित किया है। यह व्यवस्था अवसर भी प्रदान करती है, लेकिन साथ ही सफलता को एक उत्पाद और विद्यार्थी को एक प्रतिस्पर्धी इकाई में बदलने का जोखिम भी उत्पन्न करती है।

जब सीखने की प्रक्रिया का केंद्र जिज्ञासा के बजाय परिणाम बन जाता है, तब शिक्षा का मानवीय पक्ष कमजोर पड़ने लगता है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने चेताया था— किसी बच्चे को अपनी सीमित सीख तक सीमित मत करो, क्योंकि वह किसी दूसरे समय के लिए जन्मा है।

 

4. डिजिटल युग : तुलना और प्रदर्शन की नई संस्कृति

डिजिटल तकनीक ने शिक्षा को नई संभावनाएँ प्रदान की हैं। ज्ञान तक पहुँच आसान हुई है, सीखने के संसाधन बढ़े हैं और अवसरों का विस्तार हुआ है। किंतु इसके साथ ही तुलना और प्रदर्शन की संस्कृति भी अभूतपूर्व रूप से तीव्र हुई है।

सोशल मीडिया पर उपलब्धियों की निरंतर प्रस्तुति अनेक विद्यार्थियों को यह विश्वास दिलाती है कि हर समय सर्वश्रेष्ठ होना ही सफलता की शर्त है। परिणामस्वरूप आत्म-संतोष की जगह तुलना और आत्मविश्वास की जगह असुरक्षा का भाव जन्म लेने लगता है।

ऑस्कर वाइल्ड का प्रसिद्ध कथन यहाँ मार्गदर्शक बन जाता है— स्वयं बनिए; बाकी सभी भूमिकाएँ पहले से ही भरी जा चुकी हैं।

5. मानसिक स्वास्थ्य : दबाव का मौन संकट

यही निरंतर तुलना, अपेक्षाओं का बोझ और प्रदर्शन की संस्कृति विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। परीक्षा का दबाव केवल शैक्षणिक चुनौती नहीं रह जाता, बल्कि आत्म-मूल्य, आत्मविश्वास और भावनात्मक संतुलन का प्रश्न भी बन जाता है।

कक्षा में बैठा वह विद्यार्थी, जो बाहर से सामान्य दिखाई देता है, भीतर ही भीतर असफलता के भय से जूझ रहा हो सकता है। परिणाम आने से पहले की बेचैनी, अपेक्षाओं को पूरा न कर पाने की चिंता और स्वयं को लगातार दूसरों से तुलना करने की आदत ऐसे मानसिक दबाव उत्पन्न करती है, जो दिखाई नहीं देते, लेकिन गहरे प्रभाव छोड़ जाते हैं।

कार्ल रॉजर्स का विचार यहाँ महत्वपूर्ण है— जब मैं स्वयं को स्वीकार करता हूँ, तभी परिवर्तन की वास्तविक प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

6. ‘स्व’ की खोज : शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को स्वयं से परिचित कराना भी है। ‘स्व’ की खोज आत्म-ज्ञान, आत्म-स्वीकृति और आत्म-विकास की सतत प्रक्रिया है।

यदि परीक्षा विद्यार्थियों की रचनात्मकता, समस्या-समाधान क्षमता, सहयोग, संवेदनशीलता और जीवन-कौशल को विकसित करने का माध्यम बने, तो वह केवल मूल्यांकन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व-निर्माण का साधन बन सकती है।

सच्ची शिक्षा वह है जो बालक की शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्तियों का सर्वांगीण विकास करे।

7. शिक्षा का पुनर्संतुलन : आगे की राह

आज आवश्यकता परीक्षा को समाप्त करने की नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य को पुनर्परिभाषित करने की है। इसके लिए—

– मूल्यांकन को अधिक कौशल-आधारित और बहुआयामी बनाया जाए।
– मानसिक स्वास्थ्य एवं परामर्श सेवाओं को विद्यालयी व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।
– माता-पिता और शिक्षकों में अपेक्षाओं के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित किया जाए।
– रचनात्मकता, सहयोग, आलोचनात्मक चिंतन और जीवन-कौशल को शिक्षा के केंद्र में रखा जाए।
– सफलता की परिभाषा को केवल अंकों से आगे बढ़ाकर व्यक्तित्व और क्षमता के समग्र विकास से जोड़ा जाए।

8. निष्कर्ष : परीक्षा का पुनर्परिभाषण

शायद हमें स्वयं से एक प्रश्न पूछने की आवश्यकता है—क्या हम अपने बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं, या उन्हें ऐसा व्यक्ति बनते देखना चाहते हैं जो स्वयं को समझता हो, अपने निर्णय स्वयं ले सकता हो और जीवन की चुनौतियों का संतुलित सामना कर सकता हो?

परीक्षा जीवन का अंतिम सत्य नहीं, बल्कि सीखने की यात्रा का एक पड़ाव है। जब परीक्षा केवल तुलना और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन जाती है, तब वह दबाव उत्पन्न करती है; लेकिन जब वह व्यक्ति को अपनी क्षमताओं, रुचियों और संभावनाओं को पहचानने का अवसर देती है, तब वह आत्म-विकास का साधन बन जाती है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि विद्यार्थी परीक्षा में कितना सफल हुआ, बल्कि यह है कि परीक्षा ने उसे अपने बारे में कितना जानने में सहायता की।

सच्ची परीक्षा वह नहीं जो हमें दूसरों से आगे ले जाए, बल्कि वह है जो हमें अपने भीतर तक ले जाए।

9. संदर्भ एवं अध्ययन-स्रोत

शिक्षा-दर्शन एवं वैचारिक आधार

डेवी, जॉन (1916). लोकतंत्र और शिक्षा. न्यूयॉर्क: मैकमिलन प्रकाशन।
विवेकानंद, स्वामी (2006). स्वामी विवेकानंद के शिक्षा संबंधी विचार. कोलकाता: अद्वैत आश्रम।
ठाकुर, रवीन्द्रनाथ (1961). शिक्षा और व्यक्तित्व-विकास संबंधी निबंध. नई दिल्ली: साहित्य अकादेमी।
फ्रेरे, पाउलो (1970). पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र. न्यूयॉर्क: कंटिन्यूअम प्रकाशन।
नुसबॉम, मार्था सी. (2010). लोकतंत्र और मानविकी का महत्व. प्रिंसटन: प्रिंसटन विश्वविद्यालय प्रकाशन।

मनोविज्ञान, अधिगम एवं मानव विकास

रॉजर्स, कार्ल (1961). एक व्यक्तित्व का निर्माण. बोस्टन: हॉटन मिफ्लिन।
गार्डनर, हॉवर्ड (1983). मन की रूपरेखाएँ : बहु-बुद्धिमत्ता का सिद्धांत. न्यूयॉर्क: बेसिक बुक्स।
गोलमैन, डैनियल (1995). भावनात्मक बुद्धिमत्ता. न्यूयॉर्क: बैंटम बुक्स।
आइंस्टीन, अल्बर्ट (1954). विचार और मत. न्यूयॉर्क: क्राउन पब्लिशर्स।

शिक्षा नीति, मूल्यांकन एवं समकालीन अध्ययन

भारत सरकार (2020). राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020. शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) (2023). समग्र एवं दक्षता-आधारित मूल्यांकन संबंधी दिशा-निर्देश. नई दिल्ली।
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) (2021). हमारे साझा भविष्य की पुनर्कल्पना : शिक्षा के लिए नया सामाजिक अनुबंध. पेरिस।
आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) (2023). शिक्षा एक दृष्टि में. पेरिस।

मानसिक स्वास्थ्य एवं किशोर विकास

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) (2024). किशोर मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण : वैश्विक परिप्रेक्ष्य. जिनेवा।
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) (2021). विश्व के बच्चों की स्थिति : बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का संरक्षण और संवर्धन. न्यूयॉर्क।
भारतीय मनोविज्ञान संघ (2022). किशोरों में परीक्षा-तनाव और मानसिक स्वास्थ्य : समकालीन परिप्रेक्ष्य. नई दिल्ली।

 

 

संतोष साहू मोबाइल. +919827329895

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