नचिकेता पावर एंड स्टील प्लांट के क्षमता विस्तार की जनसुनवाई गुपचुप तरीके से करने की तैयारी ! जनसुनवाई का पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं करना प्रबंधक की नियत पर सवालिया निशान !
नचिकेता पावर एंड स्टील प्लांट के क्षमता विस्तार की जनसुनवाई गुपचुप तरीके से करने की तैयारी !
जनसुनवाई का पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं करना प्रबंधक की नियत पर सवालिया निशान !
न्यूज़ छत्तीसगढ़ टुडे (संतोष साहू)
बिलासपुर – बिल्हा विकासखंड के सिलपहरी में स्थित नचिकेता पावर एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड के प्रस्तावित क्षमता विस्तार के उद्देश्य से गुपचुप तरीके से जनसुनवाई का आयोजन किया जा रहा है. इस विषय में आसपास के ग्राम पंचायत कोरमी, बसिया, हरदी धुमा जैसे ग्रामीणों के सवाल लगातार तेज होते जा रहे हैं। 20 अगस्त को प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले ग्रामीणों ने न केवल जनसुनवाई की सूचना के प्रचार-प्रसार पर सवाल उठाए हैं, बल्कि क्षेत्र में पर्यावरणीय प्रभाव, गिरते भूजल स्तर और कंपनी द्वारा किए गए वृक्षारोपण के दावों को लेकर भी प्रशासन से जवाब मांगा है।
ग्रामीणों का कहना है कि किसी औद्योगिक परियोजना के विस्तार से जुड़े पर्यावरणीय निर्णय में प्रभावित लोगों को अपनी आपत्ति और सुझाव रखने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए। पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) व्यवस्था के तहत परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया निर्धारित है और जिन परियोजनाओं में जनसुनवाई लागू होती है, वहां सार्वजनिक भागीदारी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जनसुनवाई की सूचना पर सबसे बड़ा सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि 20 अगस्त की प्रस्तावित जनसुनवाई को लेकर क्षेत्र में अपेक्षित स्तर पर प्रचार-प्रसार नहीं किया गया। उनका कहना है कि गांवों में मुनादी नहीं कराई गई और जनसंपर्क विभाग के माध्यम से भी व्यापक समाचार प्रचार नहीं दिखा, जिसके कारण अनेक ग्रामीणों को जनसुनवाई की जानकारी समय पर नहीं मिल पाई।
ग्रामीणों का सवाल है कि यदि जनसुनवाई प्रभावित जनता की राय जानने का माध्यम है तो इसकी सूचना गांव-गांव तक पहुंचाना क्यों सुनिश्चित नहीं किया गया?
ईआईए प्रक्रिया में सार्वजनिक सूचना और जनभागीदारी का उद्देश्य ही यह है कि प्रभावित क्षेत्र के लोग परियोजना के संभावित प्रभावों पर अपनी बात रख सकें। हाल के आधिकारिक पर्यावरणीय दस्तावेजों में भी सार्वजनिक घोषणाओं और समाचारपत्रों के माध्यम से सूचना दिए जाने के उदाहरण मिलते हैं।
गांवों के पर्यावरण पर असर का दावा !
ग्रामीणों का आरोप है कि संयंत्र के आसपास के गांवों में धूल, धुआं, शोर और औद्योगिक गतिविधियों के कारण पर्यावरणीय स्थिति को लेकर लगातार चिंता बनी हुई है। उनका कहना है कि क्षमता विस्तार के बाद उत्पादन और परिवहन बढ़ने पर इसका प्रभाव और बढ़ सकता है।
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरणीय प्रदूषकों के उत्सर्जन और निर्वहन के लिए निर्धारित मानकों का पालन आवश्यक है। अधिनियम में वायु, जल, मृदा और अन्य पर्यावरणीय मानकों तथा प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित प्रावधानों के लिए सरकार को अधिकार दिए गए हैं।
ग्रामीणों की मांग है कि क्षमता विस्तार से पहले स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक आधार पर वायु, जल, मिट्टी और शोर की जांच कराई जाए तथा उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
वृक्षारोपण पर भी ग्रामीणों ने मांगा हिसाब
ग्रामीणों ने कंपनी के पर्यावरणीय दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अब तक क्षेत्र में कंपनी की ओर से कितने वृक्ष लगाए गए, इसका स्पष्ट विवरण सामने आना चाहिए।
ग्रामीणों का आरोप है कि आज तक कंपनी द्वारा पर्याप्त स्तर पर वृक्षारोपण नहीं कराया गया, जबकि औद्योगिक गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए हरित क्षेत्र और वृक्षारोपण महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
ग्रामीणों ने मांग की है कि कंपनी द्वारा पिछले वर्षों में किए गए वृक्षारोपण का स्थान, संख्या, प्रजाति, जीवित पौधों की संख्या और रखरखाव का विवरण सार्वजनिक किया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि पर्यावरण प्रबंधन योजना में हरित पट्टी और वृक्षारोपण को लेकर क्या लक्ष्य निर्धारित हैं।
शिलपहरी-घुमा में गिरते जलस्तर पर चिंता
ग्रामीणों ने शिलपहरी और घुमा क्षेत्र में भूजल स्तर नीचे जाने का दावा करते हुए औद्योगिक इकाई के लिए जल उपयोग पर भी सवाल उठाए हैं।
उनका कहना है कि यदि क्षेत्र में पहले से ही जलस्तर प्रभावित हो रहा है तो क्षमता विस्तार के बाद बढ़ने वाली औद्योगिक गतिविधियों के लिए अतिरिक्त जल की आवश्यकता का स्थानीय जलस्रोतों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए।
ग्रामीणों ने मांग की है कि क्षेत्र के बोरवेल, कुओं और अन्य जलस्रोतों के जलस्तर का पूर्व और वर्तमान आंकड़ों के आधार पर अध्ययन कराया जाए तथा कंपनी के जल उपयोग और जल-स्रोतों पर उसके संभावित प्रभाव की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
कानून के तहत पारदर्शिता की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया केवल कागजी औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। EIA Notification, 2006 के तहत लागू प्रक्रिया में परियोजना से संबंधित पर्यावरणीय प्रभावों और सार्वजनिक भागीदारी को महत्व दिया जाता है। आधिकारिक पर्यावरणीय दस्तावेजों में जनसुनवाई से पहले समाचारपत्रों में सूचना और गांवों में सार्वजनिक घोषणा किए जाने के उदाहरण भी दर्ज हैं।
इसी आधार पर ग्रामीणों ने मांग की है कि 20 अगस्त की जनसुनवाई से पहले सूचना के प्रचार-प्रसार, प्रभावित गांवों की वास्तविक भागीदारी, EIA/EMP दस्तावेजों की उपलब्धता और ग्रामीणों की आपत्तियों को रिकॉर्ड में लेने की प्रक्रिया स्पष्ट की जाए।