जनता की राय जरूरी या सिर्फ जनसुनवाई की औपचारिकता? गीतांजलि इस्पात के विस्तार पर उठे गंभीर सवाल गीतांजलि इस्पात का 220% क्षमता विस्तार की तैयारी, जनसुनवाई के नाम पर ग्रामीणों को अंधेरे में रखने का आरोप!

जनता की राय जरूरी या सिर्फ जनसुनवाई की औपचारिकता? गीतांजलि इस्पात के विस्तार पर उठे गंभीर सवाल     गीतांजलि इस्पात का 220% क्षमता विस्तार की तैयारी, जनसुनवाई के नाम पर ग्रामीणों को अंधेरे में रखने का आरोप!

जनता की राय जरूरी या सिर्फ जनसुनवाई की औपचारिकता? गीतांजलि इस्पात के विस्तार पर उठे गंभीर सवाल

गीतांजलि इस्पात का 220% क्षमता विस्तार की तैयारी, जनसुनवाई के नाम पर ग्रामीणों को अंधेरे में रखने का आरोप!

 

 

 

 

 

 

न्यूज़ छत्तीसगढ़ दुड़े (संतोष साहू )

 

बिलासपुर –  बिल्हा विकासखंड के सिलपहरी स्थित गीतांजलि इस्पात एंड पावर प्राइवेट लिमिटेड के प्रस्तावित क्षमता विस्तार को लेकर विवाद गहराने लगा है। स्पंज आयरन संयंत्र की उत्पादन क्षमता 30 हजार मीट्रिक टन सालाना से बढ़ाकर 96 हजार मीट्रिक टन करने की तैयारी है। यानी उत्पादन क्षमता में करीब 220 प्रतिशत की वृद्धि प्रस्तावित है। लेकिन इतने बड़े औद्योगिक विस्तार से पहले आयोजित होने वाली जनसुनवाई की सूचना ही यदि प्रभावित गांवों तक नहीं पहुंच रही है, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जनसुनवाई किसके लिए और किस उद्देश्य से आयोजित की जा रही है?

 

13 नवंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई को लेकर ग्राम पंचायत कोरमी, बसिया, हरदी, धुमा सहित आसपास के ग्रामीणों ने कंपनी और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि जनसुनवाई का पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं किया गया। गांवों में मुनादी और व्यापक जनसूचना का अभाव है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि कहीं जनसुनवाई महज सरकारी औपचारिकता बनकर न रह जाए और प्रभावित ग्रामीण अपनी आपत्तियां दर्ज कराने के अवसर से वंचित न रह जाएं।

 

220 प्रतिशत क्षमता वृद्धि, लेकिन ग्रामीणों को जानकारी तक नहीं?

 

किसी औद्योगिक संयंत्र की उत्पादन क्षमता में इतनी बड़ी वृद्धि का सीधा संबंध क्षेत्र के पर्यावरण, जल संसाधन, वायु गुणवत्ता और स्थानीय जनजीवन से होता है। ऐसे में सवाल है कि जब कंपनी उत्पादन क्षमता में भारी बढ़ोतरी की तैयारी कर रही है, तब प्रभावित गांवों के लोगों को इसकी पूरी जानकारी क्यों नहीं मिल रही है?

 

ग्रामीणों का कहना है कि जनसुनवाई का उद्देश्य केवल अधिकारियों और कंपनी प्रबंधन की मौजूदगी में बैठक आयोजित करना नहीं, बल्कि प्रभावित लोगों को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर देना है। यदि सूचना ही आम जनता तक नहीं पहुंचेगी तो जनभागीदारी कैसे सुनिश्चित होगी?

 

जनसुनवाई या महज खानापूर्ति? प्रचार-प्रसार पर सबसे बड़ा सवाल

 

ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि 13 नवंबर की प्रस्तावित जनसुनवाई को लेकर गांव-गांव में अपेक्षित प्रचार-प्रसार नहीं किया गया। न तो व्यापक स्तर पर मुनादी की जानकारी सामने आई है और न ही ग्रामीणों तक सूचना पहुंचाने के लिए प्रभावी जनसंपर्क दिखाई दे रहा है।

सवाल यह है कि क्या कंपनी प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रभावित गांवों के प्रत्येक व्यक्ति को जनसुनवाई की जानकारी मिले? क्या पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट (EIA) और पर्यावरण प्रबंधन योजना (EMP) आम लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध कराई गई है?

पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2006 के तहत लागू जनसुनवाई प्रक्रिया में सार्वजनिक सूचना और प्रभावित लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण है। ऐसे में सूचना के प्रचार-प्रसार में कथित कमी पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है।

धूल-धुआं बढ़ेगा तो जवाबदेही किसकी होगी?

 

संयंत्र के आसपास रहने वाले ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र में पहले से ही धूल, धुआं, शोर और औद्योगिक गतिविधियों को लेकर चिंता बनी हुई है। अब यदि उत्पादन क्षमता में 220 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो प्रदूषण और परिवहन का दबाव कितना बढ़ेगा, इसका जवाब कौन देगा?

ग्रामीणों ने मांग की है कि क्षमता विस्तार से पहले वायु गुणवत्ता, जल गुणवत्ता, मिट्टी और ध्वनि प्रदूषण की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच कराई जाए। जांच के वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं, ताकि ग्रामीणों को पता चल सके कि मौजूदा औद्योगिक गतिविधियों का उनके पर्यावरण पर कितना प्रभाव पड़ रहा है।

 

वृक्षारोपण के दावे पर भी कंपनी से मांगा हिसाब

 

औद्योगिक प्रदूषण के प्रभाव को कम करने के लिए हरित पट्टी और वृक्षारोपण की अहम भूमिका होती है। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी द्वारा अब तक कराए गए वृक्षारोपण की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं है।

ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि कंपनी ने अब तक कितने पौधे लगाए? कितने पौधे जीवित हैं? किस-किस स्थान पर वृक्षारोपण किया गया और उनके रखरखाव की क्या व्यवस्था है?

ग्रामीणों की मांग है कि कंपनी पिछले वर्षों के वृक्षारोपण का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करे। केवल कागजों में हरित क्षेत्र दिखाने से पर्यावरण संरक्षण नहीं हो सकता। जमीन पर कितने पेड़ मौजूद हैं, इसकी भी जांच होनी चाहिए।

 

गिरते भूजल स्तर के बीच उद्योग को कितना पानी चाहिए?

 

सिलपहरी और घुमा क्षेत्र में भूजल स्तर नीचे जाने को लेकर ग्रामीणों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि जब क्षेत्र के ग्रामीण पहले से ही जलस्रोतों को लेकर परेशान हैं, तब संयंत्र की उत्पादन क्षमता बढ़ने के बाद अतिरिक्त पानी की जरूरत स्थानीय जलस्रोतों पर क्या असर डालेगी?

कंपनी प्रतिदिन कितना पानी उपयोग करती है? क्षमता विस्तार के बाद पानी की आवश्यकता कितनी बढ़ेगी? पानी का स्रोत क्या होगा? क्या इसके लिए भूजल का दोहन किया जाएगा? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।

ग्रामीणों ने क्षेत्र के बोरवेल, कुओं और अन्य जलस्रोतों के जलस्तर का तुलनात्मक वैज्ञानिक अध्ययन कराने की मांग की है।

प्रशासन बताए, जनसुनवाई को पारदर्शी बनाने की क्या तैयारी?

 

ग्रामीणों का कहना है कि पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जनसुनवाई में प्रभावित लोगों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

अब सवाल जिला प्रशासन और पर्यावरणीय जनसुनवाई कराने वाले अधिकारियों से है कि क्या 13 नवंबर से पहले प्रभावित गांवों में व्यापक प्रचार-प्रसार कराया जाएगा? क्या EIA और EMP रिपोर्ट ग्रामीणों को उपलब्ध कराई जाएगी? क्या ग्रामीणों की आपत्तियों और सुझावों को निष्पक्ष तरीके से दर्ज किया जाएगा?

बड़ा सवाल यह है कि जब कंपनी को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने की इतनी जल्दी है, तो ग्रामीणों को पूरी जानकारी देने और उनकी बात सुनने में इतनी ढिलाई क्यों? आखिर जनसुनवाई जनता की सहमति और आपत्तियां जानने का माध्यम है या महज पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया पूरी करने की औपचारिकता होगी.

संतोष साहू मोबाइल. +919827329895

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